Daily Calendar

Sunday, August 21, 2011

क्या पता कल हो ना हो ….


आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो
आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो
आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो
बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो
आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो
आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो
क्या पता
कल हो ना हो ….

Tuesday, November 30, 2010

Every Child's Right to Education Act

Hi,


Recently I came across a startling fact that 8 million children in our country are denied their basic right to education. With the Right to Education Act making education free and compulsory, we must now join hands to help these children exercise this right.

UNICEF has started a movement Awaaz Do that provides us a platform to ensure that no child in this country is denied his/her basic right to education. I have joined this movement and I urge you to pledge your support to the cause.

To join the cause,
SMS AWAAZDO to 53030 or log on to http://www.awaazdo.in/

Together we can make a difference. So let’s get started.



Awaaz do!
AWAAZ DO
It’s now your opportunity to make a difference.
The more the people read about ‘Awaaz Do’, talk about it, the better chance of a child receiving his/her education.
The facts about the Right to Education Act, its significance and a lot more is given as part of the zip file. Refer to these facts and share the information with your readers. Provide them with information which they can use and further spread the message.
So first,
What Is AWAAZ DO & How Can I A Make A Difference?
All children 6 to 14 years old have the right to free and quality education under the recently passed Right to Education Act.

The RTE Act specifies minimum norms in government schools. It requires all private schools to reserve 25% of seats for children from poor families (to be reimbursed by the state as part of the public-private partnership plan).

The Act also provides that no child shall be held back, expelled, or required to pass a board examination until the completion of elementary education. There is also a provision for special training of school drop-outs to bring them up to par with students of the same age.

The RTE Act is the first legislation in the world that puts the responsibility of ensuring enrolment, attendance and completion on the Government.

The Right to Education of persons with disabilities until 18 years of age has also been made a fundamental right. A number of other provisions regarding improvement of school infrastructure, teacher-student ratio and faculty are made in the Act.
To make the Right to Education Act successful, it is important that each one of us knows about it so that every child who is not in school can be sent back for free and quality education.The time is NOW! Make A Difference.
Stand up and make some noise! Join the Awaaz Do movement by signing up now for India's children. Ask your friends to be a part of getting every single girl and boy into school. Do it now for India's future.

Come forward and donate to UNICEF to help change 8 million lives.

Spread the word to your family and friends. You can SMS, e-mail or just talk to them and ask them to speak up and raise their voice for children. One voice makes a difference but together we can help change the fate of 8 million children. The time to begin is NOW!
Find a school
near you and make a visit. Check if the school has:

• Separate toilets for boys and girls.
• Drinking water and places for students to wash their hands with soap.
• Playgrounds for playing sports and having fun.
• A school library for students and their teachers.
• Mid-day meals for children.

You can meet the school head, teachers, community members and even the parents of children enrolled there and talk to them about the RTE Act. Let them know about the highlights and let them know how every child can benefit.


Awaaz Do!

Thursday, November 25, 2010

भ्रस्टाचार : विकास में बाधक

भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि केन्द्र एवं राज्य सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है! मैं फिर से दौहरा दूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है!" शेष 10 फीसदी भ्रष्टाचार के लिये दोषी लोगों को कठोर सजा के जरिये ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की सबसे बडी समस्याओं में से एक भ्रष्टाचार से निजात पायी जा सकती है।

मेरी उपरोक्त बात पढकर अनेक पाठकों को लगेगा कि यदि ऐसा होता तो भ्रष्टाचार कभी का रुक गया होता। इसलिये मैं फिर से जोर देकर कहना चाहता हूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहती तो अवश्य ही रुक गया होता, लेकिन असल समस्या यही है कि सरकारें चाहती ही नहीं!" सरकारें ऐसा चाहेंगी भी क्यों? विशेषकर तब, जबकि लोकतन्त्र के विकृत हो चुके भारतीय लोकतन्त्र के संसदीय स्वरूप में सरकारों के निर्माण की आधारशिला ही काले धन एवं भ्रष्टाचार से रखी जाती रही हैं। अर्थात् हम सभी जानते हैं कि सभी दलों द्वारा काले धन एवं भ्रष्टाचार के जरिये अर्जित धन से ही तो लोकतान्त्रिक चुनाव ल‹डे और जीते जाते हैं।

स्वयं मतदाता भी तो भ्रष्ट लोगों को वोट देने आगे रहता है, जिसका प्रमाण है-अनेक भ्रष्ट राजनेताओं के साथ-साथ अनेक पूर्व भ्रष्ट अफसरों को भी चुनावों में भारी बहुमत से जिताना, जबकि सभी जानते हैं की अधिकतर अफसर जीवनभर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये ही अफसर हमारे जनप्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक अफसरों के बारे में जानता हूँ जो 10 साल की नौकरी होते-होते एमपी-एमएलए बनने का ख्वाब देखना शुरू कर चुके हैं। साफ़ और सीधी सी बात है-कि ये चुनाव को जीतने लिये, शुरू से ही काला धन इकत्रित करना शुरू कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के जरिये ही कमाया जा रहा है। फिर भी मतदाता इन्हें ही जितायेगा।

ऐसे हालत में सरकारें बिना किसी कारण के ये कैसे चाहेंगी कि भ्रष्टाचार रुके, विशेषकर तब; जबकि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार, जो सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है। यदि सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार को ही समाप्त कर दिया गया तो इन राजनैतिक दलों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा! परिणाम सामने है : भ्रष्टाचार देशभर में हर क्षेत्र में बेलगाम दौड़ रहा है और केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से अधिकतर लोग इस अंधी दौड़ में शामिल होने को बेताब हैं।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाया जावे।

अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौड़ में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून" बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-  भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, भ्रष्टाचार से दुखी हैं, भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया, भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।

अनेक कथित बुद्धिजीवी, निराश एवं पलायनवादी लोगों का कहना है कि अब तो भ्रष्टाचार की गंगा में तो हर कोई हाथ धोना चाहता है। फिर कोई भ्रष्टाचार की क्यों खिलाफत करेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार से तो सभी के वारे-न्यारे होते हैं। जबकि सच्चाई ये नहीं है, ये सिर्फ भ्रष्टाचार का एक छोटा सा पहलु है।

यदि सच्चाई जाननी है तो निम्न तथ्यों को ध्यान से पढकर सोचें, विचारें और फिर निर्णय लें, कि कितने लोग भ्रष्टाचार के पक्ष में हो सकते हैं?

अब मेरे सीधे सवाल उन लोगों से हैं जो भ्रष्ट हैं या भ्रष्टाचार के हिमायती हैं या जो भ्रष्टाचार की गंगा में डूबकी लगाने की बात करते हैं। क्या वे उस दिन के लिए सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-

    1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?


    2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?


    3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?


    4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?


ऐसे और भी अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।

यहाँ मेरा आशय केवल यह बतलाना है की भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

उपरोक्त विवरण पढकर यदि किसी को लगता है की भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाने के लिये अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने तरीके से भारत सरकार पर दबाव बनायें। केन्द्र में सरकार किसी भी दल की हो, लोकतन्त्रान्तिक शासन व्यवस्था में एकजुट जनता की बाजिब मांग को नकारना किसी भी सरकार के लिये आसान नहीं है।

क्या है? ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून"

 मैंने जो कुछ जाना और अनुभव किया है, उसके अनुसार देश से भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिये ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना जरूरी है, जिसके लिये केन्द्र सरकार को संसद के माध्यम से वर्तमान कानूनों में कुछ बदलाव करने होंगे एवं कुछ नए कानून बनवाने होंगे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है :-

1-भ्रष्टाचार अजमानतीय अपराध हो और हर हाल में फैसला 6 माह में हो :सबसे पहले तो यह बात समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार केवल मात्र सरकारी लोगों द्वारा किया जाने वाला कुकृत्य नहीं है, बल्कि इसमें अनेक गैर-सरकारी लोग भी लिप्त रहते हैं। अत: भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण की परिभाषा को बदलकर अधिक विस्तृत किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा इसमें केवल रिश्वत या कमीशन के लेन-देन को भ्रष्टाचार नहीं माना जावे, बल्कि किसी के भी द्वारा किसी के भी साथ किया जाने वाला ऐसा व्यवहार जो शोषण, गैर-बराबरी, अन्याय, भेदभाव, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, मापतोल में गडबडी करना, डराना, धर्मान्धता, सम्प्रदायिकता, धमकाना, रिश्वतखोरी, उत्पीडन, अत्याचार, सन्त्रास, जनहित को नुकसान पहुँचाना, अधिनस्थ, असहाय एवं कमजोर लोगों की परिस्थितियों का दुरुपयोग आदि कुकृत्य को एवं जो मानव-मानव में विभेद करते हों, मानव के विकास एवं सम्मान को नुकसान पहुंचाते हों और जो देश की लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, कानूनी एवं शान्तिपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट, नष्ट या प्रदूषित करते हों को ‘‘भ्रष्टाचार" या "भ्रष्ट आचरण" घोषित किया जावे।

इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण को भारतीय दण्ड संहिता में अजमानतीय एवं संज्ञेय अपराध घोषित किया जावे। ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों को पुलिस जाँच के तत्काल बाद जेल में डाला जावे एवं उनके मुकदमों का निर्णय होने तक, उन्हें किसी भी परिस्थिति में जमानत या अन्तरिम जमानत या पेरोल पर छोडने का प्रावधान नहीं होना चाहिये। इसके साथ-साथ यह कानून भी बनाया जावे कि हर हाल में ऐसे मुकदमें की जाँच 3 माह में और मुकदमें का फैसला 6 माह के अन्दर किया जावे। अन्यथा जाँच या विचारण में विलम्ब करने पर जाँच एजेंसी या जज के खिलाफ भी जिम्मेदारी का निर्धारण करके सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये।

====                         समाज हित में सह आभार लिया गया - source             ====

Tuesday, November 23, 2010

कन्‍या भूण हत्‍या

कन्‍या भूण हत्‍या

 

कुछ कारण हैं । जो लोग कन्‍या भूण समापन करते हैं , मेंरे दृष्टि कोण से इसमें कुछ भी गलत नहीं है । समस्‍यायें होंगी तो लोग उसका रास्‍ता  भी निकालते हैं । आज का हाल यह है कि एक लड़की की शादी में अमूमन कम से कम 6 लाख रूपये से अधिक का खर्च आता है । जिसे एकदम निम्‍न श्रेणी का किफायती विवाह कह सकते हैं । क्‍या एक साधारण , सामान्‍य व्‍यक्ति इस खर्च को उठानें की हिम्‍मत जुटा सकता है, जिसकी आमदनीं छह से दस हजार रूपये महीनें हो । ऐसा व्‍यक्ति क्‍या खायेगा, क्‍या पहनेंगा, कैसे अपनें जीवन को  बचायेगा, फिर इस दुंनिया में क्‍या इसी लिये आये हैं कि केवल तकलीफें झेलो और आराम मौज मस्‍ती के लिये सोचो मत । एक कन्‍या को पहले जन्‍म दीजिये,फिर उसकी परवरिश कीजिये । परवरिश कोई ऐसे ही नहीं हो जाती, इसमें तिल तिल करके कितनीं रकम और कितना पैसा खर्च होता है । फिर पढ़ाई मार डालती है । इस मंहगाई के दौर में किस तरह की मंहगी पढ़ायी है, यह किसी से छुपा नहीं है । वर्षों तक  पढायी होती है कितना  पैसा खर्च होता है । लडकियों की सुरक्षा करना भी एक जहमत भरा काम है । पता नहीं कब किसकी बुरी नज़र लगे , कुछ भी शारीरिक अथवा यौन उत्‍पीड़न,  हो सकता है । फिर अंत में लडंका ढूंढिये और शादी करिये । यह कहना और लिखना   जितना आसान है, ऐसा है नहीं ।पढायी तक तो लड़की आपके पास रही , यहां तक तो आपका नियंत्रण रहा । जब योग्‍य वर की तलाश में निकलेंगें तब आटे दाल का भाव पता चलता है  

कन्‍या भ्रूण समापन एक प्रकार की सामाजिक समस्‍या है, जो पूर्णतया धन से जुड़ी है, लेकिन इसके साथ साथ कुछ दूसरे भी कारण हैं । समाज व्‍यक्तियों से बनता है । व्‍यक्तियों के सामनें समस्‍यायें होंगी तो लोग उसका समाधान भी ढूंढेंगे । इन्‍हें जो अपनें हित का समाधान मिलता है तो , वे उसे अपनानें में जरा भी नहीं हिचकिचायेंगे । आज का समाज झंझट पालना कतई नहीं चाहता । मां बाप जानते हैं कि लड़की पैदा करनें में सिवाय नुकसान के कोई फायदा नहीं है । यह विशुद्ध हानि और लाभ के गणित पर आधारित सस्‍वार्थ एकल दर्शन है ।
आज आप शादी करनें जाते हैं तो कम से कम 6 लाख रूपये दहेज में खर्च होगा । यह सबसे किफायती शादी होगी । आज के दिन , जो कन्‍या पैदा होगी उसका विवाह यदि औसत में 30 वर्ष की उम्र में करेंगें तो दहेज की क्‍या हालत होगी । एक अन्‍दाज के मुताबिक यह रकम 40 लाख से साठ लाख के आसपास होंनी चाहिये । क्‍योंकि जिस रफ्तार से मंहगाई बढ़ रही है उससे तो यही स्थिति बनती है । आपके यहां यदि एक लड़की है तो प्रतिवर्ष आपको सवा लाख से लेकर दो लाख रूपये बचानें पड़ेंगे , लडकी के शादी होंनें तक । यह रकम कहां से लायेंगे , यह सोचना आपका काम है । 

कन्‍या भ्रूण समापन एक प्रकार की सामाजिक समस्‍या है, जो पूर्णतया धन से जुड़ी है, लेकिन इसके साथ साथ कुछ दूसरे भी कारण हैं । समाज व्‍यक्तियों से बनता है । व्‍यक्तियों के सामनें समस्‍यायें होंगी तो लोग उसका समाधान भी ढूंढेंगे । इन्‍हें जो अपनें हित का समाधान मिलता है तो , वे उसे अपनानें में जरा भी नहीं हिचकिचायेंगे । आज का समाज झंझट पालना कतई नहीं चाहता । मां बाप जानते हैं कि लड़की पैदा करनें में सिवाय नुकसान के कोई फायदा नहीं है । यह विशुद्ध हानि और लाभ के गणित पर आधारित सस्‍वार्थ एकल दर्शन है । इसमे कतई दो राय नहीं हो सकती है कि इस समस्‍या की मूल में आर्थिक अवस्‍था, सुरक्षा से जुड़े पहलू , अधेड़ अवस्‍था या बृद्धावस्‍था की दहलीज पर घुसते ही मानसिक और शारीरिक टेंशन की समस्‍या , अनावश्‍यक भागदौड़ , लड़के  या योग्‍य वर ढूंढनें की शरीर और मन दोंनों तोड़ देनें वाली कवायदें , भागदौड़ , जब तक लड़का न मिल जाय तब तक का मानसिक टेंशन , बेकार का सिद्ध होंनें वाले उत्‍तर , जलालत से भरा लोंगों का , लड़के वालों का व्‍यवहार झेलकर हजारों बार , लाखों बार यही विचार उठते हैं कि लडकी न पैदा करते तो बहुत अच्‍छा  होता । स्‍वयं को अपराध बोध होंनें लगता है कि बेकार में लड़की पैदा की , एक जलालत और अपनें सिर पर ओढ़ ली । शांति , चैन , मन की प्रसन्‍नता सब सब नष्‍ट हो जाती है । आप जो काम कर रहें हैं , उसमें भी आप पिछड़तें हैं । पास , पडोंस , हेती , व्‍योवहारी , मित्र आदि कहनें लगते हैं कि लड़की क्‍या कुंवारी ही घर पर बैठाये रक्‍खेंगे । आज आप शादी करनें जाते हैं तो कम से कम 6 लाख रूपये दहेज में खर्च होगा । यह सबसे किफायती शादी होगी । आज के दिन , जो कन्‍या पैदा होगी उसका विवाह यदि औसत में 30 वर्ष की उम्र में करेंगें तो दहेज की क्‍या हालत होगी । एक अन्‍दाज के मुताबिक यह रकम 40 लाख से साठ लाख के आसपास होंनी चाहिये । क्‍योंकि जिस रफ्तार से मंहगाई बढ़ रही है उससे तो यही स्थिति बनती है । आपके यहां यदि एक लड़की है तो प्रतिवर्ष आपको सवा लाख से लेकर दो लाख रूपये बचानें पड़ेंगे , लडकी के शादी होंनें तक । यह रकम कहां से लायेंगे , यह सोचना आपका काम है ।   
समस्‍या का समाधान-
 1- कन्‍या भ्रूण हत्‍या की समस्‍या को रोकनें का समाधान केवल व्‍यक्तियों की इच्‍छा पर निर्भर है । मां बाप क्‍या चाहते हैं यह सब उनके विवेक पर छोड़ देना चाहिये । मेंरी सलाह यह है कि यदि पहला बच्‍चा लड़की भ्रूण है , यह पता चल जाय , तो इस पहले भ्रूण का समापन न करायें , किसी भी हालत में । पहले गर्भ का समापन करानें से स्‍थायी बन्‍ध्‍यत्‍व की समस्‍या हो सकती है या किसी गम्‍भीर प्रकार की यौन जननांगों की बीमारी , जो स्‍वास्‍थ्‍य को लम्‍बे अरसे तक बिगाड़ सकती है । प्रथम गर्भ तो किसी हालत में न गिरवायें । यह खतरनाक है ।  
2- आजकल लिंग परीक्षण करना सरल है । यह मां बाप की मर्जी पर र्निभर करता है कि वे कन्‍या पालना चाहते हैं । अगर नहीं चाहते तो इसका समापन कराना ही श्रेयस्‍कर है । अभी समापन कराना सस्‍ता है । एक कन्‍या का पालन जरूर करें, यदि वह प्रथम प्रसव से हो ।

3- यह न विचार करें कि आप के इस कार्य से लिंग का अनुपात कम हो रहा है या अधिक । यह एक सामाजिक और आर्थिक समस्‍या से जुड़ा हुआ पहलू है । इस समस्‍या का समाधान भी समाज को ही करना पडेगा । इसका ठेका आपनें अकेले नहीं ले रखा है ।
 4- लिंग अनुपात की गड़बड़ी से समलैंगिक विवाह को प्रोत्‍साहन मिलेगा  । लड़का , लड़का से और लड़की, लड़की से शादियां करेंगी तो दहेज का प्रश्‍न नहीं होगा । ऐसे ब्‍याह से अपनें देश की जनसंख्‍या की समस्‍या भी कुछ सीमा तक कम होगी ।

5- यदि बाइ-द-वे किसी मजबूरी से कन्‍या जन्‍मना ही चाहें जो जरूर जन्‍म दें । यदि आपको कन्‍या को पालनें पोषनें में दिक्‍कत आ रही तो किसी सुपात्र व्‍यक्ति , निसंतान को कन्‍या जन्‍मतें ही दे दें । यह बहुत बड़ा दान है ।   
==== समाज हित में सह आभार लिया गया - http://larakiyan.wordpress.com/2007/05/14/hello-world/====

Thursday, November 18, 2010

Smoking can damage your fertility as well as your next generation

Here's another reason for you to kick the butt – smoking may not just harm your fertility but that of the next generation, according to scientists.

Men who smoke have a lower concentration of proteins in the testes that are essential for producing sperm, while women who smoke during pregnancy may be sowing the seeds of infertility in their unborn child, as two separate studies.

In one of the studies, researchers obtained 24 testes, from 37 to 68 day embryos after legally terminated pregnancies.

They found that the number of germ cells – responsible for forming eggs and sperm – was reduced by 55 per cent in fetuses from women who'd been smoking while pregnant. They also found a 37 per cent reduction in the ordinary or somatic cells in the embryos.

"We were very surprised that smoking so early in pregnancy has such profound effect on the number of germ cells in the gonads," New Scientist quoted co-author Claus Andersen from the University Hospital of Copenhagen in Denmark, as saying.

Results from a previous study on female fetuses showed a slightly lower corresponding reduction of germ and somatic cells – of 41 and 29 per cent respectively.

The researchers believe the reason the male embryos they studied showed higher sensitivity was because they were, on average, exposed to more cigarettes per day.

The authors do not known whether the reduction of germ cells is permanent – raising the question of whether women who smoke during pregnancy could harm the future fertility of their fetus.

Anderson says the next step is to expose cultured fetal testes to components of smoke thought to be harmful.

"We could expose the culture for a couple of weeks, and then continue [to develop] the culture without exposure and see if the cells are able to recover," he said.

In a second study, Mohamed Hammadeh from the University of the Saarland in Germany, and colleagues, examined the concentrations of two proteins called protamines P1 and P2, which are crucial to the formation of chromosomes during cell division. Changes in the concentrations of these protamines can have negative effects on male fertility.

The study, which compared sperm samples from 53 men who smoked more than 20 cigarettes per day with sperm from 63 non-smokers, found that smokers have 14 per cent lower concentration of P2, and a higher ratio of P1 to P2 overall.

They also found an increased level of "oxidative stress" in smokers – a chemical imbalance that is known to harm sperm DNA.

Since sperm can take months to develop before stored in the testes, the studies suggest that men hoping to reproduce may want to consider giving up smoking long before they try to conceive.

Sunday, November 14, 2010

ग़रीब बच्चे

 ग़रीब बच्चे: शिक्षा से वंचित नौनिहाल

सुविधा संपन्न बच्चे तो सब कुछ हासिल कर सकते हैं, लेकिन सरकार उन नौनिहालों के बारे में भी सोचे, जो गंदे नालों के किनारे रहते हैं या फ़ुट्पाथ पर सोते हैं। उन्हें न तो शिक्षा मिलती है और ना ही आवास। 'सर्वशिक्षा' के दावे पर दम भरने वाले भी इन्हें शिक्षा के मुख्यधारा से जोड़ नहीं पाते। पैसा कमाना इन बच्चों क शौक नहीं, बाल्कि मजबूरी है। शिक्षा के अभाव में अपने अधिकारों से अनभिग्य ये बच्चें बंधुआ मजदूर की तरह अपने जीवन को काम में खपा देते हैं और इस तरह देश के नौनिहाल शिक्षा, अधिकार, जागरुकता, व सुविधाओं के अभाव में अशिक्षा और अनभिग्यता के नाम पर अपने सपनों की बलि चढ़ा देता है । यदि हमें चाचा नेहरु के सपने को सच करना है तो सबसे पहले गरीबी और अशिक्षा के गर्त में फ़ंसे बच्चों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाना होगा तथा उनके अंधियारे जीवन में शिक्षा का प्रकाश फ़ैलाना होगा।
        

 ग़रीब बच्चे: कम कड़वा नहीं है सच
मुल्क में एक अलग किस्म के बच्चे भी हैं. बच्चे तो बच्चे हैं| कोई भेद उनमें नहीं होता, इसालिये उन मजबूरो की बात करनी भी जरुरी है जिनको इसका पता भी नहीं चल पाता कि बचपन  वाकयी होता क्या है।इस भाव से उनकी मुलाकात  शायद ही कभी होती हो ।अलसुबह जब सभ्य समाज़ के बच्चे गर्म रजाइयो मे सुंदर नींद का आनंद लेते है तो वे बच्चे सड़को पर कचड़ा बीनते हैं, या रेलवे के प्लेटाफ़ोर्मो पर खाना ढूँढ़ रहे होते हैं।

ऐसे बच्चे जिनका घर नहीं होता या होता भी है, तो महज समझौता होता है, अगर उनके माँ-बाप उन्हें ऐसे कामों पर नहीं  भेजेंगे, तो परिवार नहीं चल सकेगा। यही उनका  बचपन हैं। भारी बोझ है उनके कमज़ोर कांधों पर। फिर भी हिम्मत तो देखो कि वे बेफ़िक्र जीते  हैं और लड़ते हुए जिंदगी को आईना दिखाते है कि हमारे जज्बे के आगे चुनौतियां क्या हैं।


देश में पाँच करोड़ बाल श्रमिक

बालश्रम की बात करें तो अधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक देश में फिलहाल लगभग  पाँच करोड़ बाल श्रमिक हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी भारत में सर्वाधिक बालश्रमिक होने पर चिंता व्यक्त की है। ऐसे बच्चे कहीं बाल वेश्याव्रिति में झोकें गये हैं या खतरनाक उध्योगों या सड़क के किनारे किसी ढ़ाबे में जुठे  बर्तन धो रहे होते हैं या धार्मिक स्थलों व चौराहों पर भीख माँगते नज़र आते हैं अथवा साहेब लोगों के घरों में दासता का जीवन जी रहे होते हैं।
 सरकार ने सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा बच्चों को घरेलू बाल मजदूर के रूप में काम पर लगाने के विरुध एक निषेधाग्या भी जारी कर रखी है पर दुर्भाग्य से सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, बुधिजीवी समाज़ के लोग ही इन कानूनों का मखौल उड़ा रहे हैं ।
देश में करीब 12 लाख बच्चें घरों या अन्य व्यवसायिक केंद्रों में बतौर नौकर काम कर रहे हैं।  
गौरतलब है कि अधिकतर स्व्यंसेवी संस्थायें या पुलिस खतरनाक उद्योगों में कार्य कर रहे बच्चों को मुक्त तो करा लेती हैं , पर उसके बाद उनकी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं। नतीजन, ऐसे बच्चे किसी रोज़गार या उचित पुनर्वास के अभाव में पुन: उसी दलदल में या अपराधियों की शरण में जाने को मजबूर होते हैं। यही नही, आज देश के लगभग 53.22 फ़िसदी बच्चें शोषण के शिकार हैं। इनमें से अधिकांश बच्चें अपने रिश्तेदारों या  मित्रों के यौन शोषण का शिकार हैं। अपने अधिकारों के प्रति अनभिग्यत व अग्यानता
के कारण ये बच्चे शोषण का शिकार होकर जाने-अनजाने कई अपराधों में लिप्त होकर अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

Thursday, September 9, 2010

बढती जनसंख्या

मानव धरती पर ऐसा प्राणी है जिसने मात्र अपने शरीर के एक अंग से प्रक्रति का स्वरुप ही बदल दिया है! आज धरती पर उसका ही प्रभुत्व है वहीँ अन्य जीवो व वनस्पतियों का जीवन उस पर आधारित हो गया है! मानव किसी भी जीव की आबादी जब चाहे बाधा सकता है जब चाहे उसके वजूद को धरती से मिटा सकता है !

वनस्पतियाँ अपनी प्राकर्तिक प्रजनन व रूप खो चुकी है उन्हें पता भी नहीं चलता कि वो कब जवान होकर पेड़ से अलग हो जायेंगी ! मानव की बढती आबादी ने जंगलो को ख़त्म कर दिया है!

बढती जनता को रोजगार देने के लिए ,जंगलो को खत्म करने के बाद बढता औधगिकीकरण अब हमारे गाँव में पैर पसार रहा है! फलस्वरूप कम्पनियों की फक्ट्रियाँ अब गाँव की शुद्ध जलवायु में जहर घोल रही है वहां की उपजाऊ जमीन पर बसी फैक्ट्री अब गेहूँ के दाने नहीं वो कांच के गोलियां पैदा कर रही है!

जिससे खाने-पीने की चीजों की उत्पादकता में कमी आ रही है वही महंगाई को जन्म दे रही है!

वर्षा का पानी पुन: धरती में पहुचने में असमर्थ है !क्योंकि धरती का एक विशाल हिस्सा मानव ने अपनी ऐशो-आराम से ढक दिया है! और पानी का वाष्पीकरण हो जाता है धरती अपनी नमी खो रही है और उसकी बंजरता बढ़ रही है!

किसानो के द्वारा उपयोग किये जाने वाले रासायनों ने धरती के गर्भ का जीवन खतरे में डाल दिया है! अब तो जमीन में जीवनयापन करने वाले जीव अब मरनासन सिथ्ती में पहुँच गए है कई प्रजातियाँ दुर्लभ हो गयी है ! सिर्फ बढती जनसंख्या का पेट ये जीव अपनी जान देकर भर रहे है ! बढती जनसंख्या ने बड़े जंगलो को उनके जीवो के साथ उन्हें चिड़िया घरो में बदल दिया है पेड़ो पर वास करने वाले पंछी लोगो के घरो में घोसला बनाकर रहते है! जहाँ उनकी जिंदगी मौत से साए में गुजरती है! प्रकृति के बारे में एक बात कही जाती है ! कि प्रकृति मानव के खिलाफ ही रही है! थोडा सा भी परिवर्तन मानव के लिए अझेल हो जाता है एक बार सोच कर देखिये हम अन्य जीवो जिंदगी में कैसा भूचाल ला दिया होगा
जनसंख्या को रोकने के उपाए
पुरुष नसबंदी
गर्भ निरोधक गोलियां
कंडोम का इस्तेमाल 
देर से विवाह
बढती जनसँख्या से नुकसान
१. गरीबी
२. अशिक्षा
३. बेरोजगारी
४. रोजगार , मकान और पीने योग्य पानी की कमी
५. महंगाई
६. खाद्यान संकट
७. जनसँख्या बढ़ने से प्रदुषण भी बढ़ता जा रहा है
जन जागरण अभियान 

१. हम दो हमारे दो
२. छोटा परिवार सुखी परिवार
३. बच्चे दो ही अच्छे 
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ये किसी मेले का दृश्य नहीं है बल्कि दिल्ली मेट्रो के राजीव चौक स्टेशन का नजारा है. दिल्ली मेट्रो दिल्ली के लोगों और ट्राफिक के लिए एक बहुत ही अच्छा कदम थी. पर लोगों की भीड़ देखकर लगता है अब दिल्ली सरकार को मेट्रो के लिए भी आप्शन खोजने होंगे...